तलाश

क्या  करू मै, क्या ना करू
मुझे न कभी समझेगा,
पुछू सवाल खुदसे ,तो ये मन
अपनेही जवाबो में उलझेगा,

सोचती हु ,
बारिश  में भीग मै जाऊ,
तो कभी सुनहरे धुप में नहाऊ ,
कही चल पडू वो अनजानी  राह,
जहा खुद को खो के ,खुद ही को पा जाऊ

राह है इतनी ,कौनसी राह में  चलु ,
किस मंजिल को पाके ,
अपने सपनो मे रंग भरु

सोचती हूँ
राह आयी हर मुश्किल ,
पार मै कर जाऊ
जहा खुद को खो के,खुद ही को पा जाऊ

बस एकही सपना था मेरा
कुछ अलग मै कर जाऊ
रंगिन इस दुनिया मै,
अपना अलगसा एक रंग में छोड़ जाऊ

इंतजार हे बस उस एक पल का
जहा हर उलझे सवालो के जवाबो से
वाकिफ में हो जाऊ .....जिस पल में

खुद को खो के ,खुदही को पा जाऊ
                                                         

N shivani

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